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Wednesday, August 4, 2021

राजीव भारती_ तकदीर(हिंदी मुहावरे बडे़ बावरे

                            


# नमन मंच

# साहित्य पोथी

# विधा : गीत

# विषय : तकदीर(हिंदी मुहावरे बड़े बावरे)

# दिनांक :२७/०७/२१, 

# दिन बुधवार



बिना मेहनत कभी ये तक़दीर न बनती

तक़दीर तो परिश्रम से सदा ही बदलती

भाग्य भरोसे जीवन की गाड़ी न चलती

तक़दीर सदा श्रमसाधकों का साथ देती


आखिर कब तक छाती पर मूंग दलोगे

थोड़े बहुत ही पुरुषार्थ तो  तुम कर लो

हां ठोकर लगेगी जिस दिन ही तुम को

अक्ल ठिकाने पर आयेंगे और सोचोगे


आसमान पर यदि हो दिमाग किसी का

कार्य कदापि भी नहीं सिद्ध हुआ करते 

माना कि चिकने घड़े सदृश  हो तुम तो

अतएव टस से मस तुम कभी नहीं होगे 


बहुत ख़ाक छानने पड़ते  इस जीवन में

तब जाकर ही कहीं नौकरी तुम पाओगे 

सहज़ नहीं, एड़ी चोटी का ज़ोर लगाके

तभी बमुश्किल ही कोई नौकरी पाओगे


नौकरी पाना भी सरल नहीं टेढ़ी खीर है

अंधे की लकड़ी तुम ठहरे मात-पिता के

अपने पैरों पर  जिस दिन  खड़े होओगे

तब जाकर ही उन आंखों के तारे बनोगे


अपने मुंह मियां मिट्ठू बन कर तुम तो

मानो सब कुछ गुड़ गोबर  कर डालोगे

नाक भौं मत सिकोड़ो मुझ  पर तनिक 

वर्ना तीन तेरह होकर  तुम रह जाओगे


अभी तो तुमको किंचित एहसास नहीं 

जब तक घर में तुम्हें भोजन हैं  मिलते

आटा दाल के भाव तुम्हें तब ज्ञात होंगे

जिस दिन तुम्हारे नाक में नकेल पड़ेंगे


मान लो अब भी अच्छी बात मेरी तुम 

अन्यथा कल  तुम फिर बगलें झांकोगे

मुंह की खाकर तुम बहुत  पछताओगे

और अपना सा मुंह लेकर रह जाओगे




राजीव भारती

पटना बिहार (गृह नगर)


किरण पांडेय_ हिंदी मुहावरे बड़े बावरे

                 

               

नमन मंच साहित्य पोथी

विषय मुहावरे बडे़ बावरे

दिनांक 28.7.2021

विधा कविता

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तुम खून पसीने एक करो

मैं खाक छानते रहती हूँ! 

काम जरा तुम नेक करो

देखो ना  ..... 

मनुष्य गिरगिट सा रंग बदलता है! 


दांतों तले चने चबवाने हैं

गद्दारो की खाट खड़ी करवाने हैं

फिर शत्रु के छाती पर सांप लोटेगें

उनके रेतों का महल गिरायेंगे! 


नाक के बाल नहीं, तुम आम नहीं

फिर गिदड़ भभकी क्यों डरायेगी! 

तिल को ताड़ बनाना छोड़ो

खुशी वरना नौ दो ग्यारह हो जायेगी! 


चूहे बिल्ली में है बैर नहीं

पर निकल आये चींटी के देखो

दांत उनके भी अब होंगे खट्टे

पानी में रह मगर से जो बैर करेंगे! 


किले रेत के मुबारक उनको

जो पल पल घुटने पर आते हैं

हम तो गागर में सागर भरते हैं

ख्याली पुलाव नहीं पकाते! 


बनना है तो गले का हार बनो

सवारी गर्दन की ठीक नहीं

घुटने टेक तो सभी देते हैं

कंगले की खुद्दारी ठीक नहीं! 


     किरन पाण्डेय

      स्वरचित

फूल सिंह_ हिंदी मुहावरे बडे़ बावरे

                               


#मंच को नमन

विषय- हिंदी मुहावरे बडे़ ही बावरे

विधा- कविता

अगर-मगर न करों यहाँ पर

साँच को होती आँच कहाँ

उल्टी गंगा वहाँ पर बहती

नाच न जाने आँगन टेढा़ जहाँ।।


चिकनी-चुपडी़ बातें करते

चोर की दाढी़ में तिनका जहाँ

बातों से वो पेट है भरते

बिन सेवा मेवा मिलें जहाँ।।


दाम बनाते काम सभी के 

तुरन्त दान कल्याण जहाँ

जितना गुड़ डालोगे मीठा होगा

होगें दोनों हाथ में लडडू वहाँ।।


सच्चाई पर टिके मुहावरे

बावरों में वो समझ कहाँ

दूध का जला छाछ फूँक-फूँककर पीता

समझ आये तब वक्त कहाँ ।।


स्वरचित व मौलिक रचना

फूल सिंह, दिल्ली

Tuesday, August 3, 2021

प्रांजली काव्या_ हिंदी मुहावरे बड़े बावरे

 मुहावरा कवित्त

"अढाई चांवल की खिचड़ी पकाई"

अपने "पांव खुद कुल्हाड़ी चलाई"

"अपना सा मुंह  "  लेकर भैय्या

महामाई की जै मनाई।


" टेढी उंगली से घी निकालना "

  बन गया जब " टेढ़ी  खीर  "

लल्लू ये कैसै भूल गये तुम

" बार बार नही लगता निशाने पे तीर " 


"आटे-दाल का भाव समझ गए " 

"लौट के बुदधु  घर को गए   "

" एक एक ग्यारह बताने वाले  "

आज खुद " नौ दो ग्यारह हो गए " 


"  एक हांथ से ताली बज न पाई  "

" अपनी ऐसी - तैसी कराई " 

"  काठ की हांडी फिर चढ न पाई " 

कहने लगे. ". भैय्या राम दुहाई. "


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गुस्ताख हिंदुस्तानी_ हिंदी मुहावरे बड़े बावरे


# सादर मंच को समर्पित
# साहित्य पोथी - साहित्य की बहती धारा
# दिन - मंगलवार
# दिनांक   27/07/2021
# विषय - हिंदी मुहावरे बड़े ही बावरे
# विधा - सजल
# तुकांत - आव
# पदांत - रे

हिंदी मुहावरे बड़े ही बावरे
 इन पर खेलें आओ दाव रे

ये भी हमारी इक विद्या है
होता इनमें हर सुलझाव रे

आती है मुस्कान कभी तो
आए सुनकर कभी ताव रे

वैसे तो ये होते औषधि
किंतु देते कभी घाव रे

ये तो सारे सेर पसेरी
इनको समझो नहीं पाव रे

मिलते हैं नि :शुल्क हमें तो
फिर भी इनका ऊंचा भाव रे

इनको जो पतवार बनाले
डूबे उसकी नहीं नाव रे

प्रसिद्धि गुस्ताख वो पाए
जिसको होता इनका चाव रे

     स्वरचित मौलिक
    गुस्ताख हिन्दुस्तानी
( बलजीत सिंह सारसर )
            दिल्ली

फूल चंद्र विश्‍वकर्मा_ हिन्‍दी मुहावरे बडे़ बावरे

 साहित्य पोथी मंच

दिनांक २६-७-२०२१

विषय- हिंदी मुहावरे, बड़े बावरे

विधा  कविता


हिन्दी मुहावरों की कुछ पूछो न बात। 

ये देते भाषा को चमत्कारिक सौगात।। 

कभी कान खींचो, कभी कान खाओ। 

कभी उल्लू सीधा कभी उल्लू बनाओ।। 

दुखी देख कुछ नौ दो ग्यारह हो जाते। 

कुछ तीन का तेरह करके दिखाते।। 

कभी चलते वे आँख में आँख डाले।

 कभी लाल पीली कर सबको डराते।। 

अब आँख का पानी मर सा गया है। 

वह आँखें बिछाए ठहर सा गया है।। 

कोई बात में अंगारे बरसाने लगा है। 

कोई कोई अंगारों पे चलने लगा है।। 

नहीं लाज आती शरम बेंच खाई। 

नेता  यहाँ  रोज खाते मलाई।। 

कभी आटे डाल का भाव मालूम होता। 

कंगाली में केवल आटा गीला होता।। 

मुहावरों की भाषा मुहावरों का खेल। 

कठिन है निकालना बालू से तेल।। 

हिंदी के मुहावरे बड़े बावरे हैं। 

पथ मै बिछाते पलक पाँवडे हैं।। 


फूल चंद्र विश्वकर्मा